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चेरो विद्रोह
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यह विद्रोह स्थानीय राजाओं एवं अंग्रेज कम्पनी दोनों के विरुद्ध था जोकि बिहार में सन् 1800 ई० मेंं बिहार के जमींदार वर्ग चेरो जनजाति के लोगों की जमीनें छीनने के विरुद्ध था। इस आंदोलन का नेतृत्व भूषण सिंह नामक जमींदार ने किया।
ऑपरेशन "सफ़ेद सागर" को 26 मई 1999 को शुरू किया गया था और 11 जुलाई, 1999 को सभी सैन्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के बाद इसे समाप्त कर दिया गया था। यह सैन्य बल के इतिहास में पहली बार था जब वायुयानों का उपयोग भारतीय वायु सेना द्वारा 32,000 फीट तक की ऊंचाई पर किया गया था। अप्रैल 1999 में पाकिस्तानी सेना ने मुजाहिदीन (अनियमित) के तत्वों के साथ मिलकर LOC व कारगिल में 168 किमी अन्दर घुसकर उच्चतम जमीन और सहज बिंदुओं पर कब्जा कर लिया गया है। भारतीय सेना द्वारा बिना आज्ञा प्रवेशके लिए 7-8 मई को दण्ड की घोषणा की गई थी और सेना के साथ-साथ खुफिया एजेंसियों के लिए एक पूर्ण आश्चर्य के रूप में आया था। आईएएफ को शामिल करने का निर्णय 24 सरकार को भारत सरकार के उच्चतम स्तर पर निर्भरता के बाद 24 साल की शुरुआत की गई थी और निर्देशों को संयुक्त रूप से जारी किया गया था, सेना के साथ, घुसपैठियों का समर्थन करें। यह बल दिया गया था कि आईएएफ को ...
फराजी आंदोलन का मुख्य उद्येश्य इस्लाम धर्म में सुधार करना था। इसे 'फराइदी आंदोलन' के नाम से भी जाना जाता था जिसकी शुरुआत पूर्वी बंगाल में 'हाजी शरियतुल्लाह' के द्वारा की गई थी। हाजी शरियतुल्लाह का मुख्य उद्येश्य इस्लाम धर्म के लोगों को सामाजिक भेदभाव एवं शोषण से बचाना था। परंतु शरियतुल्लाह की मृत्यु के पश्चात सन् 1840 ई० में इस आंदोलन का नेतृत्व उनके पुत्र दूदू मियाँ के द्वारा संभालने पर इस आंदोलन ने क्रांतिकारी रूप अख्तियार कर लिया। दूदू मिंया ने गांव से लेकर प्रांतीय स्तर तक प्रत्येक स्तर पर एक प्रमुख नियुक्त किया। इस आंदोलन में ऐसे क्रांतिकारियों का दल तैयार किया गया जिन्होंने हिन्दू जमींदारों एवं अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष किया। दूदू मियां को पुलिस के द्वारा कई बार गिरफ्तार किया गया तथा इन्हें सन् 1847 ई० में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया जिससे आंदोलन नेतृत्वहीन हो गया।सन् 1862 ई० दूदू मिंया की मृत्यु के पश्चात आंदोलन मंद पड़ गया।
अतरंजीखेड़ा गंगा की एक सहायक कली नदी के तट पर उत्तर प्रदेश के एटा जनपद में एक प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक खुदाई पुरातात्विक स्थल है । इस साइट को पहली बार 1862 में सर अलेक्जेंडर कुनीघम द्वारा पहचाना गया था, लेकिन 1962 में आर सी गौर द्वारा खोदने वाले सात स्थलों में चल रहे व्यवसाय की अनूठी निरंतरता को प्रकट करने के लिए खुदाई की गई थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग के द्वारा अपने ग्रन्थ में इस स्थाल का नाम पिलोशान कहा गया है। अतरंजीखेड़ा में गैर मृदभाण्ड संस्कृति से लेकर गुप्त वंश तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां से हडप्पाटालीन धान की खेती के साक्ष्य प्राप्त हुए। काले एवं लाल मृदभाण्ड भी प्राप्त हुए। कुषाण वंश के लाल बर्तन, मध्ययुगीन चमकदार बर्तन आदि अवशेष प्राप्त हुए हैं।
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