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Santhal Rebellion (1855-56) - the story of kanhu and siddhu

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Key points:santhal rebellion,santhal vidroh, santhal movement, santhal andolan, santhal ka sangarsh, kanhu and siddhu andolan, संथाल विद्रोह, संथाल आंदोलन, कान्हु और सिद्धू का आंदोलन This movement started in 1855-56 AD in protest against the exploitation of local landlords, Mahajans and employees of English company in Bhagalpur area of ​​Bihar. The movement was led by two brothers Kanhu and Sidhu.  The people of the Santhal tribe lived in the hills of the rajmahal. These people used to burn grass in forest for cultivate farming and animal husbandry in the mountains for livelihood , but due to their limited resources in the mountains, they used to loot in nearby plains and go through the mountains. They used to live on the paths of life by putting a stalker. But when in 1770, by the company rule, the lack of agricultural land was devastated by the mountains and the money collected by the landlord and the moneylenders continued to be used, in such cases, these people...

स्वामी विवेकानन्द जी- परिचय एवं विचारधारा

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स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक कायस्थ परिवार में  हुआ था। उनका बचपन का नाम नरेंद्र दत्त था । उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट में वकील थे जोकि पश्चिमी सभ्यता से काफी प्रभावित हुए। इनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचार रखतीं थी वो भगवान शिव की पूजा करतीं थीं परिवार के संस्कार और धार्मिक विचारों को देखकर विवेकानंद जी बचपन से ही जिज्ञासु थे वे भगवान के बारे में जानने के इच्छुक थे। स्वामी जी ने ईश्वर के बारे में जानने के लिए ब्रह्म समाज की सदस्यता ग्रहण की परंतु वहां इन्हें संतोषजनक ज्ञान प्राप्त न होने के कारण रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु मान लिया और उन्हीं से आध्यात्म की शिक्षा प्राप्त की। रामकृष्ण परमहंस केवल अद्वैत दर्शन के प्रर्वतक थे।      स्वामी जी ने वर्ष 1893 में शिकागो ( यू०एस०ए०) में आयोजित ' विश्व धर्म सम्मेलन ' में हिस्सा लिया। स्वामी विवेकानंद जी ने हिन्दू धर्म के बारे में पूरी दुनिया के प्रतिनिधियों को जानकारी दी। वह ' नव हिन्दूवाद ' के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि थे। इन्होंने वर्ष 1897 में बेलूर ( कलकत्ता ) में रामकृष्ण मि...

फराजी आंदोलन Farazi movement

     फराजी आंदोलन का मुख्य उद्येश्य इस्लाम धर्म में सुधार करना था। इसे 'फराइदी आंदोलन' के नाम से भी जाना जाता था जिसकी शुरुआत पूर्वी बंगाल में 'हाजी शरियतुल्लाह' के द्वारा की गई थी। हाजी शरियतुल्लाह का मुख्य उद्येश्य इस्लाम धर्म के लोगों को सामाजिक भेदभाव एवं शोषण से बचाना था। परंतु शरियतुल्लाह की मृत्यु के पश्चात सन् 1840 ई० में इस आंदोलन का नेतृत्व उनके पुत्र दूदू मियाँ के द्वारा संभालने पर इस आंदोलन ने क्रांतिकारी रूप अख्तियार कर लिया। दूदू मिंया ने गांव से लेकर प्रांतीय स्तर तक प्रत्येक स्तर पर एक प्रमुख नियुक्त किया। इस आंदोलन में ऐसे क्रांतिकारियों का दल तैयार किया गया जिन्होंने हिन्दू जमींदारों एवं अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष किया।               दूदू मियां को पुलिस के द्वारा कई बार गिरफ्तार किया गया तथा इन्हें सन् 1847 ई० में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया जिससे आंदोलन नेतृत्वहीन हो गया।सन् 1862 ई० दूदू मिंया की मृत्यु के पश्चात आंदोलन मंद पड़ गया।

थियोसोफिकल सोसायटी

         इस आंदोलन की शुरुआत दो पाश्चात्य बुद्धिजीवियों रुस की मैडम एच. पी. ब्लावैटस्की तथा कर्नल एच. एस. अल्काट ( यू.एस.ए.) के द्वारा की गयी जिसमें इनका सहयोग विलियम जज द्वारा किया गया। इन्होंने भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर 17 नवंबर 1875 को न्यूयॉर्क (यू.एस.ए.) में 'थियोसोफिकल सोसायटी' की शुरुआत की।सन् 1879 ई० में इन्होंने मुंबई में अपना कार्यालय खोला। सन् 1882 ई० में अपना मुख्य कार्यालय अमेरिका से मद्रास के निकट अड्यार नामक स्थान पर परिवर्तित कर दिया। सन् 1907 ई० में कर्नल अल्काट की मृत्यु के पश्चात श्रीमती एनी बेसेंट सोसायटी की अध्यक्ष चुनीं गई। एनी बेसेंट के अध्यक्ष बनने के पश्चात सोसायटी की लोकप्रियता में काफी वृद्धि हुई। श्रीमती एनी बेसेंट ने बनारस में हिन्दू स्कूल की स्थापना की। इस स्कूल में धर्म एवं पाश्चात्य वैज्ञानिक विषयों पर शिक्षा दी जाती थी। सन् 1915-16 मेंं मदनमोहन मालवीय जी के द्वारा बनारस हिन्दू स्कूल को बनारस हिन्दू महाविद्यालय में परिवर्तित कर दिया गया। थियोसोफिकल सोसायटी के अनुयायी ईश्वरीय ज्ञान को आत्मिक हर्षोन्माद एवं अंतर्दृष्टि ...

सत्यशोधक समाज एवं ज्योतिबा फुले

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  ज्योतिबा फुले का जन्म सन् 24 सितंबर 1873 ई० को पूना के शूद्र माली जाति में हुआ था। उन्होंने सामाजिक न्याय एवं दलित उत्थान के अथक प्रयास किए। ज्योतिबाफुले जाति प्रथा के पूर्ण उन्मूलन एवं सामाजिक-आर्थिक समानता के पक्षधर थे। उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की तथा ब्राह्मण वादी संस्कृत समाज का विरोध किया। सत्यशोधक समाज का मुख्य उद्येश्य सामाजिक सेवा तथा स्त्रियों एवं निम्न जाति के लोगों के बीच शिक्षा का प्रसार करना था। उन्होंने ब्राह्मणों के प्रतीक चिन्ह 'राम' के विरोध में 'राजा बालि' को अपना प्रतीक चिन्ह बनाया। फूले के आंदोलनों के कारण समाज में दलितों का उत्थान हुआ तथा ब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त हो गया। उन्होंने ब्राह्मणों का वर्चस्व के कारण ही ' भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' का भी विरोध किया। उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले की सहायता से पूना में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की तथा उन्होंने महाराष्ट्र में विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए कार्यक्रम प्रारम्भ किया। फुले की मृत्यु के पश्चात सत्यशोधक समाज की कमान छत्रपति शाहू ने संभाली। ज्योतिबा फुले द्वारा ...

ईश्वर चंद्र विद्यासागर

               बंगाल में जन्मे ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का बचपन का नाम ईश्वर चन्द्र बंदोपाध्याय था।वे ऐसे उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास करते थे जो मानवता के लिए समर्पित तथा गरीबों के लिए उदार हों । ईश्वर चन्द्र विद्यासागर 1850 में संस्कृत कालेज के प्रधानाचार्य बने। उन्होंने संस्कृत पर ब्रहामणों के एकाधिकार को चुनौती देते हुए गैर-ब्राह्मणों को भी संस्कृत अध्ययन के लिए प्रोत्साहित किया तथा संस्कृत कालेज में आधुनिक दृष्टिकोण का प्रसार करने के लिए अंग्रेजी शिक्षा का प्रबंध किया। उन्होंने संस्कृत भाषा का बंगाल में प्रसार करने के लिए बांग्ला भाषा में वर्णमाला भी लिखी।     विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह के लिए शसक्त आंदोलन चलाया। उन्हीं के प्रयासों से सन् 1856 ई० में तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने 'हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम,'XV' , पारित किया।उन्होंने स्वयं भी एक विधवा के साथ विवाह किया तथा अपने इकलौते पुत्र का विवाह भी एक विधवा के साथ किया।   1840 एवं 1850 के दशक में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से स्त्री...

आर्य समाज एवं दयानंद सरस्वती

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       आर्य समाज हिन्दू धर्म का एक सुधारवादी आंदोलन था।इसके संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी थे। महर्षि दयानंद सरस्वती का बचपन का नाम मूलशंकर था।ये सत्य की तलाश में 15 वर्ष इधर उधर भटकते रहे तथा वेदांत की शिक्षा मथुरा के अंधे गुरु स्वामी विरजानंद से प्राप्त की। इन्होंने वेदों को सच्चा तथा सभी धर्मों से हटकर बताया। इन्होंने कहा कि वेद भगवान द्वारा प्रेरित हैं और सम्पूर्ण ज्ञान का श्रोत हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना 29 जनवरी 1875 में की थी तथा दूसरी शाखा की स्थापना 1877 ई० में की। इन्होंने वेदों की शिक्षा को सम्पूर्ण मानकर हिन्दू धर्म में कुरीतियों को अस्वीकार करके अपने अनुयायियों को वैदिक धर्म के पालन का निर्देश दिया।       महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा माना तथा सर्वप्रथम स्वराज शब्द का प्रयोग किया। इन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करके, स्वदेशी अपनाने पर जोर दिया। महर्षि दयानंद सरस्वती जी को ' भारत का मार्टिन लूथर' कहा जाता है। इन्होंने नारा दिया , 'भारत भारतीयों के लिए' एवं 'वेदों की ओर लोटो'...

यंग बंगाल आन्दोलन एवं हेनरी विवियन डेरोजियो

19 वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में बंगाल के बुद्धिजीवियों में उग्र एवं आधुनिक प्रवृति का जन्म हुआ। इन्होंने सामाजिक कुरीतियों एवं अंधविश्वासों का तीव्र विरोध किया। इस आंदोलन को 'यंग बंगाल आंदोलन' के नाम से जाना जाता है। इसकी शुरुआत कलकत्ता के हिन्दू कालेज के प्राध्यापक( 1826-1831) अॉग्ल-भारतीय, हेनरी विवियन डेरोजियो ने की थी। हेनरी विवियन डेरोजियो फ्रांस की क्रांति से प्रभावित थे, अतिवादी विचार रखते थे। उन्होंने रूढिवादी एवं पुराने रीतिरिवाजों का विरोध किया।        हेनरी ने 'बंगाल स्पेक्टेटर' नामक् पत्रिका का संपादन किया। आध्यात्मिक उन्नति और समाज सुधार के लिए उन्होंने ' एकेडमिक एसोसिएशन', 'सोसायटी फॉर एक्वीजिशन अॉफ जनरल नॉलेज', 'एग्लो- इंडियन हिन्दू एसोसिएशन', 'बंगहित सभा' और 'डीबेटिंग क्लब' आदि का गठन किया। कट्टर हिंदुओं के विरोधस्वरूप हेनरी को हिन्दू कालेज से निकाल दिया गया। इसके बाद हेनरी ने 'ईस्ट इंडिया' नामक् दैनिक समाचार पत्र का संपादन किया।हेनरी को आधुनिक भारत का 'प्रथम राष्ट्रवादी कवि' कहा जाता है।  हेनहरी ...

राजा राममोहन राय

ब्रिटिश साम्राज्य का भारत में उपनिवेश स्थापित हो जाने के बाद भारत में भी तर्कवाद, मानवतावाद और विज्ञानवाद की धारणाओं ने 'पुनर्जागरण' की प्रिक्रिया को आरम्भ किया। उन्हीं में एक प्रमुख नाम है राजा राममोहन राय का इन्होंने पुरानी मान्यताओं ओर अंधविश्वासों को त्याग कर नयी मान्यताओं को अपनाने पर बल दिया।      राजा राममोहन राय को 'आधुनिक पुरूष', 'पुनर्जागरण का मसीहा', 'आधुनिक भारत का निर्माता', 'भारतीय छितिज का सबसे चमकदार तारा' और 'भारतीय राष्ट्रवाद का पैगम्बर' के उपनाम से जाना जाता है। राजा राममोहन राय ईस्ट इंडिया कंपनी में कर संग्राहक के पद पर कार्यरत थे परन्तु उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास एवं कुरीतियों को देखकर अपनी नोकरी त्यागकर भारतीय समाज के उत्थान में जुट गए। उन्हें राजा की पदवी मुगल बादशाह अकबर द्वितीय के द्वारा प्रदान की गई। कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष      राजा राममोहन राय ने सभी धर्मों को एक ईश्वर का मूर्त रूप माना। उन्होंने प्राचीन वेदों का उदाहरण देते हुए एकैश्वरवाद के सिद्धांत को माना। एकैश्वरवाद के प्रचार के ल...