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शिवाजी का जीवन परिचय- Life of Shivaji

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शिवाजी का जीवन‌-परिचय-               शिवाजी भोंसले का जन्म 10 अप्रैल 1627 को पश्चिमी महाराष्ट्र में शिवनेर के किले में हुआ था। वे अहमदनगर, दक्कन और बीजापुर राज्य के एक सैन्य अधिकारी शाहजी भोंसले के पुत्र थे। उनकी माता जीजाबाई एक अत्यंत धार्मिक महिला थीं। शिवाजी अपनी मां और उनके शिक्षक दादाजी कोंडा-देव की सख्त निगरानी में पूना पले-बढे। उन्हें दादा जी कोंडा-देव द्वारा उन्हें एक प्रशासक और एक विशेषज्ञ सैनिक बनाया गया था। एक जवान लड़के के रूप में, शिवाजी में देशभक्त और एक योद्धा के गुण दिखाए। बीजापुर और अहमदनगर साम्राज्यों के पतन ने शिवाजी की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को तेज कर दिया। उन्होंने अपने शिक्षक दादा जी कोंडा-देव की सलाह के खिलाफ जाकर पूना के पास पहाड़ी किलों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। जब 1647 में कोंड देव की मृत्यु हो गई,तब शिवाजी को अपनी महत्वाकांक्षाओं को क्रियाओं में बदलने का मौका मिला। सैनिक जीवन शिवाजी ने मावेल्स के नाम से जाने वाले कठोर किसानों के कर इकट्ठा करके और बीजापुर साम्राज्य के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू क...

सावंतवादी विद्रोह

सावंतवादी विद्रोह की शुरुआत एक मराठा सरदार फोण्ड सावंत के नेतृत्व में सन 1944 में हुई। इन्होंने कुछ सरदारों तथा देसाइयों की सहायता से कुछ किलों पर अधिकार कर लिया था। बाद में अंग्रेज सेना ने इन विद्रोहियों को मुठभेड़ के पश्चात परास्त कर दिया और सावंतों के अधिकार वाले किलों को कब्जे में लेकर सावंतों को किले से बाहर खदेड़ दिया। कुछ विद्रोही जान बचाकर गोवा भाग गये थे और बचे हुए विद्रोहियों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।

बुन्देला विद्रोह क्यों हुआ ?

 1835 ई० में अंग्रेजों ने उत्तर-पश्चिम प्रांत नामक एक नया प्रांत बनाया, जिसमें मराठों से छीने गये आधुनिक मध्यप्रदेश के दो जिले भी मिलाये गए-सागर एवं दमोह|इस प्रांत में 'बर्ड कमीशन' के प्रतिवेदन पर महलवारी बन्दोबस्त किया गया, जिसमें बीस वर्षों के लिए लगान का निर्धारण बढी हुई दर पर कर दिया गया। इससे यहां के जमींदार नाराज हो गये और उनसे जब लगान जबरदस्ती वसूल किया जाने लगा, तो सागर के दो जमींदारों जवाहर सिंह  एवं मधुकरशाह ने 1842 ई० में विद्रोह कर उत्पात मचाना शुरू कर दिया। 1843 ई० तक इस विद्रोह पर काबू पा लिया गया और लगान भी कम कर दिया गया।

कोलिय विद्रोह

कोलिय जाति के लोग महाराष्ट्र में मराठा पेशवाओं के दुर्गों के सैनिक के रूप में कार्य करते थे। अंग्रेजी साम्राज्य आ जाने के कारण दुर्गों को अस्त व्यस्त कर दिया गया जिससे ये लोग बेगार हो गये तथा अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन करने लगे। वर्तमान महाराष्ट्र के पश्चिमी हिस्से एवं गुजरात के कच्छ छेत्र में कोलियों ने विद्रोह की आवाज बुलंद कर ली। सन 1824 ई० में सरदार गोविंद राव के नेतृत्व में विद्रोह की शुरुआत हुई।जिसे अंग्रेजों के द्वारा सन् 1825 में दबा दिया गया।फिर सन् 1839 ई० में पूना छेत्र के आसपास विद्रोह शुरू हुआ जो कि लगभग 1850 ई० तक चला।इस विद्रोह में प्रमुख  विद्रोही भाऊ सरे, चिमनाजी यादव,नाना दरबारे, रघु भंगारिया, बापू भंगारिया आदि ने समय-समय पर नेतृत्व किया।अन्य आंदोलनों के विद्रोहियों ने भी सहयोग किया।